मुंबई: रस्किन बॉन्ड की लोकप्रिय लघु कहानी ‘द आईज हैव इट’ पर आधारित, संतोष सिंह द्वारा निर्देशित फिल्म ‘आँखों की गुस्ताख़ियाँ’ आज, 11 जुलाई 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गई है। इस रोमांटिक ड्रामा में विक्रांत मैसी और शनाया कपूर मुख्य भूमिकाओं में हैं, और यह शनाया कपूर की बॉलीवुड में पहली फिल्म है। फिल्म से एक खूबसूरत, भावनात्मक और रुहानी प्रेम कहानी की उम्मीद थी, लेकिन शुरुआती समीक्षाओं के अनुसार, यह उस गहराई और एहसास को पर्दे पर उतारने में नाकाम रही है।
कहानी: एक दिलचस्प शुरुआत जो भटक गई
फिल्म की कहानी जहान (विक्रांत मैसी) नामक एक नेत्रहीन संगीतकार और सबा (शनाया कपूर) नामक एक थिएटर आर्टिस्ट के इर्द-गिर्द घूमती है। सबा अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर एक अंधे व्यक्ति के किरदार के लिए तैयारी कर रही है, और इसी दौरान उसकी मुलाकात एक ट्रेन में जहान से होती है, जो वास्तव में देख नहीं सकता। ट्रेन का यह सफर दोस्ती और फिर प्यार में बदल जाता है। दोनों के बीच एक खास रिश्ता बनता है, जो आंखों से नहीं, बल्कि खामोशी और दिल की बातों से जुड़ता है। हालांकि, जहान अपनी सच्चाई सबा को नहीं बता पाता और वैलेंटाइन डे के दिन सबा के अपनी आंखों की पट्टी उतारने से पहले ही उसे छोड़कर चला जाता है।
समीक्षकों का मानना है कि फिल्म की शुरुआत तो अच्छी है और यह एक दिल को छू लेने वाली कहानी की उम्मीद जगाती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह अपनी लय खो देती है। कई दृश्यों में तार्किकता की कमी और अनावश्यक रूप से खींचा जाना फिल्म को कमजोर करता है। कुछ समीक्षकों ने तो इसे ‘दिल के अरमान आंसुओं में बह गए’ जैसी स्थिति बताया है।
अभिनय: विक्रांत मैसी का जलवा बरकरार, शनाया को करना होगा और काम
विक्रांत मैसी ने नेत्रहीन संगीतकार जहान के किरदार में एक बार फिर अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। उनकी सहज और वास्तविक प्रस्तुति ने किरदार में जान डाल दी है, और कई लोगों ने उनके प्रदर्शन को ‘दिल छू लेने वाला’ बताया है। वे फिल्म को अपने कंधों पर उठाने की कोशिश करते नज़र आते हैं।
वहीं, शनाया कपूर ने अपने डेब्यू के हिसाब से ठीक-ठाक काम किया है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और आत्मविश्वास ध्यान खींचता है, लेकिन कुछ भावनात्मक दृश्यों में उनकी संवाद अदायगी और हाव-भाव सपाट लगे हैं। समीक्षकों का कहना है कि उन्हें अपने एक्सप्रेशंस और डायलॉग डिलीवरी पर और काम करने की ज़रूरत है, ताकि वह बॉलीवुड में लंबा सफर तय कर सकें। सहायक कलाकारों का प्रदर्शन औसत रहा है।
निर्देशन और संगीत:
संतोष सिंह का निर्देशन कुछ हिस्सों में अच्छा है, खासकर फिल्म की सिनेमैटोग्राफी को सराहा गया है, जो ‘विजुअली ब्यूटीफुल’ लगती है। फिल्म का संगीत, विशेष रूप से शीर्षक गीत ‘आँखों की गुस्ताख़ियाँ’ और ‘नज़ारा’, दर्शकों को पसंद आ रहे हैं और फिल्म के भावनात्मक पहलू को बढ़ाते हैं। हालांकि, निर्देशन में कहानी की गहराई को पूरी तरह से पकड़ पाने की कमी महसूस की गई है।
कुल मिलाकर प्रतिक्रिया और बॉक्स ऑफिस:
फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों से मिली-जुली प्रतिक्रिया मिल रही है। कुछ लोग इसे ‘फील-गुड’ फिल्म बता रहे हैं, तो कुछ इसे ‘बोरिंग’ और ‘उम्मीदों पर खरा न उतरने वाली’ करार दे रहे हैं। ‘मालिक’ और ‘सुपरमैन’ जैसी बड़ी फिल्मों के साथ बॉक्स ऑफिस पर टक्कर होने के कारण, ‘आँखों की गुस्ताख़ियाँ’ की शुरुआत धीमी रही है, और यह बॉक्स ऑफिस पर संघर्ष कर सकती है।
यदि आप एक हल्की-फुल्की रोमांटिक ड्रामा देखने के शौकीन हैं और रस्किन बॉन्ड की कहानियों से प्यार करते हैं, तो ‘आँखों की गुस्ताख़ियाँ’ को एक बार देखा जा सकता है, बशर्ते आप बहुत ज़्यादा उम्मीदें न रखें।

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